Friday, January 12, 2024
मेरा संघर्ष भरा जीवन ।
आज दिनांक 13/01/2024 है और अभी जब मैं ये आर्टिकल लिख रहा हूं तब तक मेरा एसएससी का सिलेबस खतम हो चुका है और तैयारी जोरों शोरों से चल रही है , क्योंकि जुलाई या फिर अगस्त में CGL का एग्जाम है और मुझे कुछ भी करके इस पेपर को पास करना है । मैं फरीदाबाद के एक छोटे से गांव आत्मदपुर में रहता हूं अपने पिता जी के साथ , और जिस रूम में हम रहते हैं , उसकी हालत बहुत खराब है 8×8 का रूम है उसी में मैं, मेरा छोटा भाई और मेरे पिता जी रहते हैं। आप इस तस्वीर में कमरे का दृश्य देख सकते हैं
ये एक ब्रेंच है जिसपे मेरी किताबे हैं और हम नीचे सोते हैं।
यह रूम की एक विडियो है जिसमे आप रूम की हालत देख सकते हैं मेरे घर में मेरी बहन के बाद मैं सबसे बड़ा हूं इसलिए मेरे ऊपर काफी जिम्मेदारियां भी हैं , जिसकी वजह से मुझे सरकारी नौकरी 2024 में ले लेनी है जिससे मेरे परिवार की दैनिक जीवन में सुधार आ सके। मेरे पिता जी बहुत मेहनत करते हैं, और उनकी मेहनत से मुझे प्रेरणा मिलती है जिससे और पढ़ने का जुनून सा आता है । नौकरी के बाद छोटे भाई को स्पेयर पार्ट्स का बिजनेस करना है , पिता जी के लिए स्टेशनरी शॉप, मम्मी जी के लिए बुटीक और बहुत कुछ जो संभव हो पाएगा ।
गांव के घर की दयनीय हालत है , इसलिए एक अच्छा सा इकोफ्रेंडली घर भी बनाना है।
पिताजी के साथ एक तस्वीर घर के ओसारा में
आज की स्टोरी इधर तक ही रखते हैं ।
Saturday, June 5, 2021
Breaking News
1."सुमीत समोस" एक उगते भविष्य का नाम।
"सुमीत समोस" ये नाम आज कल बहुजन मीडिया में चर्चा का विषय बना हुआ है , आपको बता दें की "सुमीत समोस" ओडिशा के रहने वाले हैं , और ये एक बहुजन समाज से आने वाले रैपर गायक हैं और ये जाति व्यवस्था के विरुद्ध अपनी आवाज को रैप के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाते हैं। ये अपनी आगे की पढाई विदेश में जाकर करना चाहते हैं लेकिन इसके लिए उनके पास पैसे नहीं थे , जिसके चलते उनको क्राउड फंडिंग से पैसे इकट्ठे करने पड़े। अधिक जानकारी के लिए आप यहां पढ़ें
3 घंटें में 37 लाख रुपये इकट्ठे कर बहुजन समाज ने इतिहास रच दिया।
— Sumit Chauhan (@Sumitchauhaan) June 6, 2021
ये खबर सुकून देने वाली है। सुमित ऑक्सफॉर्ड जा रहे हैं और ये सब मुमकिन हुआ बहुजन समाज की बदौलत। हमें ऐसे ही अपने प्रतिभावान लड़कों-लड़कियों और थर्ड जेंडर को शिक्षा हासिल करने में मदद करनी चाहिए। जय भीम https://t.co/PvOMBJojUE
2.बहुजन समाज के नेता ।
आज के दौर में हम जहाँ तक देख पा रहे हैं , वहाँ तक ये साफ नजर आ रहा है कि किस तरीके से बहुजन समाज कई हिस्सों में बटते जा रहा है , आज बहुजन समाज के हितैसी अपनी-अपनी रोटियां सेकने में लगे हुए हैं। उदाहरण के तौर पे उत्तर प्रदेश , जहाँ पर बहुजनों की कई सारी पार्टियां हैं , जैसे :- बीएसपी, सपा और आसपा इत्यादि। लेकिन इनके अमर्थक आपस में मतभेद रखते हैं और बटे हुए हैं , जिसका फायदा अन्य पार्टियों को भरपूर हो रहा है , उदाहरण के तौर पर बीजेपी और कांग्रेस। यह पार्टियां अब उत्तर प्रदेश में अपनी सरकारें बनाने में सक्षम हैं , और आने वाले 2022 के चुनाव में भी परिणाम देखने को मिल सकता है। वैभव कुमार की ये खास रिपोर्ट
3. गिन्नी माही एक बहुजन कलाकार।
"गिन्नी माही" बहुजन समाज के बीच एक बहुचर्चित नाम है , आपको बता दें की गिन्नी माही पंजाब जलंधर की रहने वाली हैं और यह एक बेहतरीन गायिका हैं , इनके लाखों चाहने वाले हैं। अभी हाल ही में उनको फेमिनिज़म इन इंडिया के द्वारा सम्मानित किया गया है , अधिक जानकारी के लिए ये खास रिपोर्ट
गिन्नी माही की कला दलित समुदाय की एक सशक्त आवाज़ है और वह उन लाखों करोड़ों लोगों की बात को दुनिया के सामने रख रही है जिन्होंने जाति के आधार पर हिंसा झेली है। #Caste#PunjabiSingerhttps://t.co/ZkhEByeULt
— फेमिनिज़म इन इंडिया (@FIIHindi) June 4, 2021
Tuesday, April 27, 2021
मेरे स्कूल के दिन ।
मेरा परिचय
मेरा नाम राहुल गौतम है और मेरे माता जी का नाम श्री राजमती देवी है और पिता जी का नाम श्री हरिश्चंद गौतम है। मैं उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिला के छोटे से गाँव (बेलवाना) से तालुक रखता हूँ ।
2006 : जब मैं सिर्फ 4-5 साल का था
- ये वो समय था जब प्राइवेट स्कूल (श्रमजीवी बालिका इण्टर कॉलेज) में मेरा "कक्षा 1" में दाखिला हुआ था । जब मैं पहली बार स्कूल में गया तो मेरे साथ मेरी माता जी भी गई थी मुझे छोड़ने के लिए , वो मेरा पहला दिन था, तो मैं कक्षा में जाने से डर लग रहा था। तभी मेरे कक्षा के अध्यापक जिनका नाम "गोकरण सिंह" था वो आएं और मुझे उठा कर कक्षा में बैठा दिए मैं रोने लगा और घर जाने की जिद्द करने लगा और उस वक्त मेरी माता जी मेरी तरफ देख कर फिर घर चली गईं।
- दूसरे दिन मैं स्कूल नहीं गया और मेरी माता जी ने भी कुछ नहीं कहा , उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं आज मत जाओ लेकिन कल जरूर जाना, मैंने कहा, 'हाँ ठीक है ' मैं अक्सर कक्षा में सबसे पीछे बैठता था । क्योंकि मुझे आगे बैठने में डर लगता था और जो बच्चे कक्षा में ज्यादा चंट होते थे वो मुझसे लड़ाई कर लेते थे और मैं पिट जाता था और रोने लगता था , और अध्यापक मेरी एक भी नहीं सुनते थे ।कक्षा में बच्चे आगे की सीट कब्ज़ा करके रखते थें इसलिए मैं पीछे जाकर सर नीचे कर के अपना खेलने में मस्त रहता था किसी से कोई मतलब नहीं रखता था । और स्कूल का काम तो करने में जैसे जान ही निकल जाती थी जिसके कारण अध्यापक की डाँट खाना पड़ता था। एक दिन जब मैं कलम के ढक्कन से खेल रहा था तो वो ढक्कन जाकर अध्यापक के चश्मे पर लग गया जिसके बाद खूब मार पड़ी। मुझसे बोला गया कि अपने माता जी को बुला कर लाना नहीं तो मत आना। फिर दूसरे दिन मैं बुला कर ले गया , और अधयाक ने मेरी खूब शिकायत लगाई और कहने लगे की 'आपके बच्चे ने मेरा चस्मा तोड़ दिया है और मुझे दूसरा चस्मा लेकर दो ' मेरी माता जी ने उन्हें कहा कि बच्चा है गलती हो गई और फिर माता जी ने भी डाँट लगाया। दरअसल मेरे अधयापक दो-दो चस्मा लगा कर आते थे , और उस दिन उनका चस्मा टूटा भी नहीं था लेकिन फिर भी वो झूठ बोल गए लेकिन दूसरे दिन फिर वही चस्मा पहन कर आये।
- कुछ दिन बाद नए अध्यापक (महेंद्र सिंह) आएं जोकि विज्ञानं पढ़ाते थें ,वो जो भी पढ़ाते थें उनका एक भी पढ़ाया हुआ मेरे पल्ले नहीं पड़ता था ,और मैं पीछे बैठ कर सोने लग जाता था जिसके चलते मुझे मार खानी पड़ती थी , वो ऐसा मारते थें की हाथ पर छाले पड़ जाते थें। जोकि मुझे बहुत ज्यादा बुरा लगता था। मेरा पढाई में मन नहीं लगता था और अब मैं स्कूल जाने की बजाय मेरे घर के पास एक नहर के पास एक पेड़ के नीचे खेलता रहता था। और शाम होती स्कूल से बच्चो के साथ घर चला आता। ऐसा करते हुए मेरी माता जी ने पकड़ लिया और फिर इतना मार पड़ी की हद से ज्यादा ,ऐसा चलता रहा दो-तीन सालों तक ,कभी स्कूल जाता तो कभी नहीं जाता । अब मैं 4 कक्षा की परीक्षा देने गया और परीक्षा में कुछ भी नहीं आता था तो मैं उत्तर की जगह प्रश्न ही लिखकर दे दिया और चला आया। छोटी क्लास के बच्चों को पास कर देते हैं जिसके चलते मुझे भी पास कर दिया गया। मैं खुश था लेकिन उस स्कूल में दुबारा जाने के लिए नहीं बल्कि इसलिए क्योंकि अब मैं दिल्ली आने वाला था इसलिए।
फरवरी 2010 : मैं दिल्ली पहुंच गया
मेरे पिता जी हमें यहाँ लाएं, कुछ दिन बाद स्कूल में दाखिले के लिए गएँ , स्कूल में दाखिला नहीं हुआ क्योंकि हम प्रवेश परीक्षा नहीं दे पाएं। उसके बाद मेरे पिता जी मेरी बहन और मेरे पर बहुत गुस्सा हुए लेकिन फिर हम 1 साल तक कोचिंग गएँ
जिससे हमें अब पढाई समझ आने लगी थी। फिर एक साल बाद उसी सरकारी स्कूल(राजकीय माध्यमिक विद्यालय एत्मादपुर ) में हमारा दाखिला हुआ कक्षा 5 में । अब मुझे पढाई करने में अच्छा लगता था और मैं रोज स्कूल जाने लगा मुझे विज्ञान पढ़ने में अच्छा लगता था और गणित के सवाल भी अच्छे लगते थें। धीरे-धीरे 3 साल बीत चुके थें अब कक्षा में पढ़ने में अच्छा लगता था अब डर नहीं लगता था।
अगस्त 2014 : मैंने दूसरे स्कूल में दाखिला ले लिया
- अब मैंने एक सरकारी स्कूल (राजकीय बाल वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय ओल्ड फरीदाबाद ) में कक्षा 8 में दाखिला लिया। अब मैं रोज स्कूल जाने लगा लेकिन मुझे दोपहर में घर चले आने की आदत हो गई थी , जिसके चलते मुझे डाट खानी पड़ती थी । एक मेरी कक्षा अध्यापिका थीं जिनका नाम था "श्री ज्योति यादव" जोकि सामाजिक विज्ञान पढ़ाती थीं । वह बहुत ही अच्छी अध्यापिका थीं जिनके मार्गदर्शन से मुझे आगे बढ़ने का हौसला मिला , उनके जैसे लोग शायद गिनती के होते हैं।

उन्होंने हमें केवल एक साल तक पढ़ाया उसके बाद सम्बिदा पर होने के कारण उनकी नौकरी छूट गई और फिर हमें "श्री हरविंदर सिंह " पढ़ाने लगें, जोकि विज्ञान पढ़ाते थें। अब हम कक्षा 9 में प्रवेश कर चुके थें । अब जैसा की हमें "श्री हरविंदर सिंह " जी पढ़ाने लगे थें तो हमें भी नए अध्यापक से पढ़ने की जिज्ञाषा थी। सब कुछ सही चल रहा था हम विज्ञान को और अच्छे से समझने का प्रयास कर रहे थें। ये अध्यापक बड़े ही सख्त मिजाज के थें , जो बच्चे नहीं पढ़ते थें या काम पूरा नहीं करते थें उनकी तो रेल बना देते थें मार- मार के , मैं उन में से था जो अपना काम पूरा कर के रखते थें तो मेरी कभी उनसे कोई कहा सुनी नहीं हुई। और मुझे विज्ञान पढ़ने में ज्यादा अच्छा लगता था ,तो जिसके चलते उनसे मैं सवाल पूछता रहता था। और उन्हें भी बताने में अच्छा लगता था , और इस तरह उनसे मेरा लगाओ बढ़ने लगा। पढ़ने में सही था तो सरे अध्यापक भी तारीफ करते थें। इस तरीके से पढाई और मौज मस्ती के साथ कक्षा 9 की पढाई भी पूरी हो गई।
- अब हम कक्षा 10 में प्रवेश कर चुके थे उसके साथ ही पढ़ाई का बोझ दोगुना हो चूका था। अब और बच्चो से अलग रहने लगा क्योंकि अबकी बोर्ड की परीक्षा में बैठना था, तो ज्यादा पढ़ना भी जरुरी था आगे की पढाई के लिए , जिसको ध्यान में रखते हुए पढाई करने लगा। एक मजे की बात यह थी कि मैं कभी किसी से मुकाबला नहीं करता था पढ़ने में लेकिन लोग मुझसे ज्यादा नंबर लाने के लिये ना जाने क्या क्या करते थें , मेरे क्लास में एक मॉनिटर था जिसका नाम "दीपेश" था , वो मुझसे खूब चिढ़ता था ।

- क्योंकि उसके नंबर मेरे से काम ही आते थें और वो मॉनिटर भी था तो अध्यापक उसका मजाक बना देते थे। और भी बच्चे थे कक्षा में जो मुझे नकारात्मक दिशा की ओर धक्का देने में लगे थें , मुझे पढ़ते देख कहते थे कि 'अबे तू फेल हो जाएगा, तू एक-दो विषय में लटकेगा आदि आदि ' मैं उनकी बातों पर थोड़ा भी ध्यान नहीं देता था। एक मेरे गणित के अध्यापक "श्री कुलदीप सिंह" थें जिन्होंने मुझे हौसला दिया की 'बेटा तुझे टॉप करना है ' मैंने उनसे वादा कर दिया की जी गुरु जी टॉप तो मैं ही करूँगा। उसके बाद कुछ समय के बाद बोर्ड के पेपर हुए , उसका परिणाम घोषित हुआ , और अपने पुरे स्कूल में, मैं टॉप आया उस समय मेरे अंक प्राप्त हुए थें। और हमारे कक्षा का मॉनिटर बेचारा फेल हो गया जिसको सुनके मैं तो हैरान था कि जिसके कक्षा में इतनी तारीफें होती थी कि पढ़ने में होसियार है वो फेल कैसे हो गया ? मुझे सच में उसके लिए दुःख भी था।
कक्षा 11वीं और 12वीं की ओर
- हमारा स्कूल 8वीं से लेकर 12वीं तक था तो आगे की पढाई भी वहीँ हुई। अब आई विषय चुनने की बारी जिसको लेकर मैं पहले से बिल्कुल दृढ था कि मुझे विज्ञान ही लेना है , क्योंकि मेरे पिता जी विज्ञान लेकर पढ़े थें तो उनसे और अपने गुरु जनों से भी प्रेरित था।
- जिसके चलते मैंने विज्ञान लिया ,और अब मेरी कक्षा ११वीं की नई अध्यापिका "श्री चित्रा यादव " थीं जोकि रासायन विज्ञान पढ़ाती थीं। इन्होंने हमें दो साल पढ़ाया , दो सालों में बहुत से अच्छे दोस्त बने , स्कूल में पढाई के साथ मौज मस्ती करते हुए दो साल कब बीत गएँ पता ही नहीं चला। जिसके बाद हम 2019 में 12वीं की परीक्षा दिए और उसका परिणाम आया उसमे भी अच्छे अंक प्राप्त हुए।

आगे की पढाई "दिल्ली विश्वविद्यालय" से
- स्कूल और अपने आस पास "दिल्ली विश्वविधालय " का भौकाल सूना था तो उसमे दाखिला लेना तो लाजिमीय हो जाता है। दाखिला के लिए फॉर्म भरा और नंबर आ गया , जिसके बाद "दिल्ली विश्वविधालय" के पहले कॉलेज में दाखिला हुआ। जिसमे मैंने "(B.Sc physical science with electronics)" कोर्स को चुना।

दिल्ली विश्वविधालय
To be continue on next time
:- राहुल गौतम
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Friday, April 23, 2021
भारत में मौत का तमाशा देखता नीरव !
ये निराव कौन था ?
दरअसल रोम एक शहर का नाम है जो कि ईटली में स्थित है, नीरव रोम का सम्राट हुआ करता था, कहते हैं वर्ष 64 ईस्वीं में रोम में भयंकर आग लगी थी जो लगभग छह दिन तक जलती रही , वहां के लोग मर रहे थे लेकिन नीरव अपने धुन में मस्त होकर तमाशा देख रहा था।
भारत बनाम रोम और मोदी बनाम नीरव ?
आज भारत भी एक आग में झुलस रहा है रोम शहर की तरह और वो आग है कोरोना महामारी कि हमारे देश के प्रधानमंत्री चुनावी रैली कर रहे हैं, जनता से उनको कोई लेना देना नहीं है उनको तो बस सत्ता की भूख लगी है जिसके चलते मोदी जी नीरव की तरह मगन होकर अपनी मनमानी कर रहे हैं।
लोगों के मौत का जिम्मेदार कौन?
आज कोरोना महामारी के आये हुए एक साल से ज्यादा हो चूका है , लेकिन हमारी सरकार आज भी वहीँ खड़ी है जहाँ कल थी , शुरू -शुरू में तो इन्होने यह कह कर पल्ला झाड़ लिया था कि इस महामारी से लड़ने के लिए तैयार नहीं थे। लेकिन आज एक साल के बाद भी हमारी स्वास्थ व्यवस्था नहीं बदली , आज लोग ऑक्सीजन की कमी से अपनी जान गवां दे रहे हैं।
देश में क्या कुछ बदला CORONA काल में?
- ये बात व्यंग के साथ दर्ज होगी इतिहास में कि जब हमारे देश को अच्छे अस्पताल , स्कूल और कॉलेज इत्यादि कि जरुरत थी तो हमारे देश का प्रधानमंत्री मंदिर बनवा रहा था।
COURTESY:-NAWESNATION
अगर मंदिर से हमारे देश के लाखो लोग बच जाते तो आज पूरी दुनिया मंदिर ही बनवा लेती अपने लोगों को बचाएं के लिए।
- आज धर्म के नाम पर एक विशेष धर्म के लोग इकठ्ठा हो रहें हैं सिर्फ आस्था के नाम पर क्या वहाँ कोरोना नहीं है ? अगर
COURTESY:-ThePrint
आप इन बातों पर विचार करें तो ये साफ हो जायेगा कि सरकार की गलत नीतियों के चलते आज लाखों लोग मारे जा रहे हैं।
आप इन बातों पर विचार करें तो ये साफ हो जायेगा कि सरकार की गलत नीतियों के चलते आज लाखों लोग मारे जा रहे हैं।
:- राहुल गौतम
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मेरा संघर्ष भरा जीवन ।
आज दिनांक 13/01/2024 है और अभी जब मैं ये आर्टिकल लिख रहा हूं तब तक मेरा एसएससी का सिलेबस खतम हो चुका है और तैयारी जोरों शोरों से चल रही है...






