Tuesday, April 27, 2021

मेरे स्कूल के दिन ।

 



मेरा परिचय 

मेरा नाम राहुल गौतम है और मेरे माता जी  का नाम श्री राजमती देवी है और पिता जी का नाम श्री हरिश्चंद गौतम है।  मैं उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिला के छोटे से गाँव (बेलवाना) से तालुक रखता हूँ । 

2006 : जब मैं सिर्फ 4-5 साल का था 

  • ये वो समय था जब प्राइवेट स्कूल (श्रमजीवी बालिका इण्टर कॉलेज) में मेरा "कक्षा 1" में दाखिला हुआ था । जब मैं पहली बार स्कूल में गया तो मेरे साथ मेरी माता जी भी गई थी मुझे छोड़ने के लिए , वो मेरा पहला दिन था, तो मैं कक्षा में जाने से डर लग रहा था। तभी मेरे कक्षा के अध्यापक जिनका नाम "गोकरण सिंह" था वो आएं और मुझे उठा कर कक्षा में बैठा दिए मैं रोने लगा और घर जाने की जिद्द करने लगा और उस वक्त मेरी माता जी मेरी तरफ देख कर फिर घर चली गईं।   




  • दूसरे दिन मैं स्कूल नहीं गया और मेरी माता जी ने भी कुछ नहीं कहा , उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं आज मत जाओ लेकिन कल जरूर जाना,  मैंने कहा, 'हाँ  ठीक है ' मैं अक्सर कक्षा में सबसे पीछे बैठता था । क्योंकि मुझे आगे बैठने में डर लगता था और जो बच्चे कक्षा में ज्यादा चंट होते थे वो मुझसे लड़ाई कर लेते थे और मैं पिट जाता था और रोने लगता था ,  और अध्यापक मेरी एक भी नहीं सुनते थे ।कक्षा में बच्चे आगे की सीट कब्ज़ा करके रखते थें इसलिए  मैं पीछे जाकर सर नीचे कर के अपना खेलने में मस्त रहता था किसी से कोई मतलब नहीं रखता था । और स्कूल का काम तो करने में जैसे जान ही निकल जाती थी जिसके कारण अध्यापक की डाँट खाना पड़ता था। एक दिन जब मैं कलम के ढक्कन से खेल रहा था तो वो ढक्कन जाकर अध्यापक के चश्मे पर लग गया जिसके बाद खूब मार पड़ी। मुझसे बोला गया कि अपने माता जी को बुला कर लाना नहीं तो मत आना।  फिर दूसरे दिन मैं बुला कर ले गया , और  अधयाक ने मेरी खूब शिकायत लगाई और कहने लगे की 'आपके बच्चे ने मेरा चस्मा तोड़ दिया है और मुझे दूसरा चस्मा लेकर दो ' मेरी माता जी ने उन्हें कहा कि बच्चा है गलती हो गई और फिर माता जी ने भी डाँट लगाया।  दरअसल मेरे अधयापक दो-दो चस्मा लगा कर आते थे , और उस दिन उनका चस्मा टूटा भी नहीं था लेकिन फिर भी वो झूठ बोल गए लेकिन दूसरे दिन फिर वही चस्मा पहन कर आये। 
  • कुछ दिन बाद नए अध्यापक (महेंद्र सिंह) आएं जोकि विज्ञानं पढ़ाते थें ,वो जो भी पढ़ाते थें उनका एक भी पढ़ाया हुआ मेरे पल्ले नहीं पड़ता था ,और मैं पीछे बैठ कर सोने लग जाता था जिसके चलते मुझे मार खानी पड़ती थी , वो ऐसा मारते थें की हाथ पर छाले पड़ जाते थें। जोकि मुझे बहुत ज्यादा बुरा लगता था। मेरा पढाई में मन नहीं लगता था और अब मैं स्कूल जाने की बजाय मेरे घर के पास एक नहर के पास एक पेड़ के नीचे खेलता रहता था। और शाम होती स्कूल से बच्चो के साथ घर चला आता। ऐसा करते हुए मेरी माता जी ने पकड़ लिया और फिर इतना मार पड़ी की हद से ज्यादा ,ऐसा चलता रहा  दो-तीन सालों तक ,कभी स्कूल जाता तो कभी नहीं जाता ।  अब मैं 4 कक्षा की परीक्षा देने गया और परीक्षा में कुछ भी नहीं आता था तो मैं उत्तर की जगह प्रश्न ही लिखकर दे दिया और चला आया। छोटी क्लास के बच्चों को पास कर देते हैं जिसके चलते मुझे भी पास कर दिया गया।  मैं खुश था लेकिन उस स्कूल में दुबारा जाने के लिए नहीं बल्कि इसलिए क्योंकि अब मैं दिल्ली आने वाला था इसलिए।


फरवरी 2010 : मैं दिल्ली पहुंच गया  

मेरे पिता जी हमें यहाँ लाएं, कुछ दिन बाद स्कूल में दाखिले के लिए गएँ , स्कूल में दाखिला नहीं हुआ क्योंकि हम प्रवेश परीक्षा नहीं दे पाएं। उसके बाद मेरे पिता जी मेरी बहन और मेरे पर बहुत गुस्सा हुए लेकिन फिर हम 1 साल तक कोचिंग गएँ 


जिससे हमें अब पढाई समझ आने लगी थी।  फिर एक साल बाद उसी सरकारी स्कूल(राजकीय माध्यमिक विद्यालय एत्मादपुर ) में हमारा दाखिला हुआ कक्षा 5 में । अब मुझे पढाई करने में अच्छा लगता था और मैं रोज स्कूल जाने लगा मुझे विज्ञान पढ़ने में अच्छा लगता था और गणित के सवाल भी अच्छे लगते थें। धीरे-धीरे 3 साल बीत चुके थें अब कक्षा में पढ़ने में अच्छा लगता था अब डर नहीं लगता था।  

अगस्त 2014 : मैंने दूसरे स्कूल में दाखिला ले लिया 

  • अब मैंने एक सरकारी स्कूल (राजकीय बाल वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय ओल्ड फरीदाबाद ) में कक्षा 8 में दाखिला लिया। अब मैं रोज स्कूल जाने लगा लेकिन मुझे दोपहर में घर चले आने की आदत हो गई थी , जिसके चलते मुझे डाट खानी पड़ती थी । एक मेरी कक्षा अध्यापिका थीं जिनका नाम था "श्री ज्योति यादव" जोकि सामाजिक विज्ञान पढ़ाती थीं । वह बहुत ही अच्छी अध्यापिका थीं जिनके मार्गदर्शन से मुझे आगे बढ़ने का हौसला मिला , उनके जैसे लोग शायद गिनती के होते हैं।  
    उन्होंने हमें केवल एक साल तक पढ़ाया उसके बाद सम्बिदा पर होने के कारण उनकी नौकरी छूट गई और फिर हमें "श्री हरविंदर सिंह " पढ़ाने लगें, जोकि विज्ञान पढ़ाते थें।  अब हम कक्षा 9 में प्रवेश कर चुके थें  । अब जैसा की हमें "श्री हरविंदर सिंह " जी पढ़ाने लगे थें तो हमें भी नए अध्यापक से पढ़ने की जिज्ञाषा थी।  सब कुछ सही चल रहा था हम विज्ञान को और अच्छे से समझने का प्रयास कर रहे थें।  ये अध्यापक बड़े ही सख्त मिजाज के थें , जो बच्चे नहीं पढ़ते थें या काम पूरा नहीं करते थें उनकी तो रेल बना देते थें मार- मार के , मैं उन में से था जो अपना काम पूरा कर के रखते थें तो मेरी कभी उनसे कोई कहा सुनी नहीं हुई।  और मुझे विज्ञान पढ़ने में ज्यादा अच्छा लगता था ,तो जिसके चलते उनसे मैं सवाल पूछता रहता था।  और उन्हें भी बताने में अच्छा लगता था , और इस तरह उनसे मेरा लगाओ बढ़ने लगा। पढ़ने में सही था तो सरे अध्यापक भी तारीफ करते थें। इस तरीके से पढाई और मौज मस्ती के साथ कक्षा 9 की पढाई भी पूरी हो गई। 

  • अब हम कक्षा 10 में प्रवेश कर चुके थे उसके साथ ही पढ़ाई का बोझ दोगुना हो चूका था। अब और बच्चो से अलग रहने लगा क्योंकि अबकी बोर्ड की परीक्षा में बैठना था, तो ज्यादा पढ़ना भी जरुरी था आगे की पढाई के लिए , जिसको ध्यान में रखते हुए पढाई करने लगा।  एक मजे की बात यह थी कि मैं कभी किसी से मुकाबला नहीं करता था पढ़ने में लेकिन लोग मुझसे ज्यादा नंबर लाने के लिये ना जाने क्या क्या करते थें , मेरे क्लास में एक मॉनिटर था जिसका नाम "दीपेश" था , वो मुझसे खूब चिढ़ता था ।
  •  क्योंकि उसके नंबर मेरे से काम ही आते थें और वो मॉनिटर भी था तो अध्यापक उसका मजाक बना देते थे।  और भी बच्चे थे कक्षा में जो मुझे नकारात्मक दिशा की ओर धक्का देने में लगे थें , मुझे पढ़ते देख कहते थे कि 'अबे तू फेल हो जाएगा, तू एक-दो विषय में लटकेगा आदि आदि ' मैं उनकी बातों पर थोड़ा भी ध्यान नहीं देता था।  एक मेरे गणित के अध्यापक "श्री कुलदीप सिंह" थें जिन्होंने मुझे हौसला दिया की 'बेटा तुझे टॉप करना है ' मैंने उनसे वादा कर दिया की जी गुरु जी टॉप तो मैं ही करूँगा।  उसके बाद कुछ समय के बाद बोर्ड के पेपर हुए , उसका परिणाम घोषित हुआ , और अपने पुरे स्कूल में, मैं टॉप आया उस समय मेरे अंक प्राप्त हुए थें। और हमारे कक्षा का मॉनिटर बेचारा फेल हो गया जिसको सुनके मैं तो हैरान था कि जिसके कक्षा में इतनी तारीफें होती थी कि पढ़ने में होसियार है वो फेल कैसे हो गया ? मुझे सच में उसके लिए दुःख भी था।  

कक्षा 11वीं और 12वीं की ओर 

  • हमारा स्कूल 8वीं से लेकर 12वीं तक था तो आगे की पढाई भी वहीँ हुई। अब आई विषय चुनने की बारी जिसको लेकर मैं पहले से बिल्कुल दृढ था कि मुझे विज्ञान ही लेना है , क्योंकि मेरे पिता जी विज्ञान लेकर पढ़े थें तो उनसे और अपने गुरु जनों से भी प्रेरित था। 

  • जिसके चलते मैंने विज्ञान लिया ,और अब मेरी कक्षा ११वीं की नई अध्यापिका "श्री चित्रा यादव " थीं जोकि रासायन विज्ञान पढ़ाती थीं।  इन्होंने हमें दो साल पढ़ाया , दो सालों में बहुत से अच्छे दोस्त बने , स्कूल में पढाई के साथ मौज मस्ती करते हुए दो साल कब बीत गएँ पता ही नहीं चला।  जिसके बाद हम 2019 में 12वीं की परीक्षा दिए और उसका परिणाम आया उसमे भी अच्छे अंक प्राप्त हुए।  

आगे की पढाई "दिल्ली विश्वविद्यालय" से 

  • स्कूल और अपने आस पास "दिल्ली विश्वविधालय " का भौकाल सूना था तो उसमे दाखिला लेना तो लाजिमीय हो जाता है।  दाखिला के लिए फॉर्म भरा और नंबर आ गया , जिसके बाद "दिल्ली विश्वविधालय" के पहले कॉलेज में दाखिला हुआ।  जिसमे मैंने "(B.Sc physical science with electronics)" कोर्स को चुना। 

                                                                      दिल्ली विश्वविधालय

To be continue on next time 


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:- राहुल गौतम  

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